देवभूमि भारत मे जन्म फिर भी दु:खी
... क्यू?
मनुष्य
किसी राष्ट्र/जाति या सम्प्रदाय का हो, पुरूष हो या महिला सभी निम्न
सुख चाहते है:- प्रचुरधन, निरोगी काया, पूर्णायु, पतिव्रता पत्नी,
अनुकूल पति, कुल-तारक सन्तान, पुराने पापों का नाश(पापों का बुरा
फल भोगे बिना), पितरों की सद्गति, ऋण मुक्ति, शत्रु-पीडा न हो, ग्रह-पीडा
न हो, समाज में प्रतिष्ठा, यश की प्राप्ति, ५० वर्ष से अधिक आयु
होने पर सांसारिक विषयों से वैराग्य, मानव जीवन की सफलता, अगला जन्म
उत्तम कुल में प्राप्त करना।
उपर्युक्त सभी सुख भारत में जन्म लेने वालों को ही प्राप्त हो सकते
है। ये सभी सुख भारत के अतिरिक्त अन्य किसी राष्ट्र-वासी को प्राप्त
नहीं हो सकते क्योंकि शास्त्रानुसार विश्व में भारत भूमि ही एकमात्र
कर्म भूमि है, अन्य सभी स्थान मात्र भोग भूमि है। (प्रमाण श्री शिवमहापुराण
उमासंहिता अध्याय १८ श्लोक १ से २२ पृष्ठ ६९४)
भारतवासियों का धन कमाने हेतु विदेश जाना मूर्खता है देवता भी मनुष्य
बनकर भारत में जन्म लेने के लिए तरसते है। ( प्रमाण श्री शिवमहापुराण
उमासंहिता अध्याय १८ श्लोक १९ पृष्ठ ६९४) फिर भी भारत में जन्में
व्यक्ति दु:खी क्यों है?
वे इसीलिए दु:खी है कि वे प्रभू के विधान को नहीं समझ रहे है।
भारत में जन्में व्यक्ति महा भाग्यशाली है। सृष्टि रचना के समय प्रभु
के शरीर से चार जातियॉं उत्पन्न हुई। मुख से ब्राह्मण, हाथों से
क्षत्रिय, जॉंघों से वैश्य और चरणों से शुद्र की उत्पत्ति हुई। (प्रमाण
श्री शिवमहापुराण अध्याय ५६श्लोक२४ से २७ पृष्ट ४८७ )
आपने शुद्र, वैश्य, क्षत्रिय,ब्राह्मण इनमें से किसी का भी अपमान
किया, किसी को कष्ट दिया, किसी का अहित किया तो वह सब प्रभु का ही
अपमान माना जाता है। (प्रमाण श्री शिवमहापुराण शतरूद्र संहिता अध्याय
२) परन्तु भोजन मुख द्वारा ही किया जाता है। इसलिए ब्राह्मण के पूजन
और ब्राह्मण को भोजन देने की सभी वेद-शास्त्रों में महिमा बताई गई
है।
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