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गुरू महिमा

देहधारी गुरू होना अनिवार्य है। गुरू कौन बन सकता है? गुरू की परीक्षा कैसे करनी चाहिए? गुरू से सांसारिक कामनाओं की प्राप्ति के लिए कैसे निवेदन करना चाहिए? सच्चा गुरू, घर बैठे ही (बिना प्रयास के) मिलता है केवल आप में सही सद्गुरू की प्राप्ति की लालसा होनी चाहिये।

देवताओं के गुरू वृहस्पति है, दैत्यों के गुरू शुक्राचार्य है, पार्वती जगदम्बा के गुरू देवर्षि नारद है, ईसा मसीह के गुरू सेंटजॉन है, आदिगुरू शंकराचार्य के गुरू गोविन्द पादाचार्य है, विष्णु के अवतार राम के गुरू वशिष्ठ है, विष्णु अवतार कृष्ण के गुरू गर्गाचार्य, हिमालय के गुरू गर्गाचार्य, रामकृष्ण परमहंस देव के गुरू तोतापुरी, विवेकानन्द के गुरू रामकृष्ण परमहंस देव, शिवाजी महाराज के गुरू समर्थ रामदास आदि ये सब बिना गुरू के नहीं चल सके। क्या आप बिना देहधारी गुरू के प्रगति कर सकेंगे ? कदापि नहीं। आध्यात्मिक प्रगति तो देहधारी सद्गुरू के बिना हो ही नहीं सकती परन्तु सांसारिक कामनाओं की प्राप्ति के लिए भी देहधारी गुरू होना अनिवार्य है। कुछ प्रमाण:

(अ) सूर्यवंशी दशरथ के पिता श्री महाराज अज, सद्गुरू वसिष्ठ से दीक्षा लेकर, भगवान शंकर की पूजा करके सेना के बिना भी राज्य करने में सफल हुए।

(ब)सूर्यवंशी राजा दशरथ ने सद्गुरू वसिष्ठ से दीक्षा लेकर श्री विष्णु को ही चार पुत्रों के रूप में प्राप्त किया - राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न।

(स)जब इन्द्र के हाथ को भगवान् शंकर ने स्तम्भित करके उसे मारना चाहा, तब गुरू वृहस्पति ने ही प्रभू शिव से प्रार्थना करके अपने शिष्य इन्द्र को मरने से बचाया।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण युद्धखंड अध्याय १३ श्लोक १५ से ३७ पृष्ठ ४०६-४०७) भगवान शंकर ही परमगुरू है और गुरू परम्परा है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण शतरूद्रसंहिता अध्याय ४-५)

एक ब्राह्मण विवाहित महिला वाष्कल ग्राम निवासी, सुन्दर पति की सेवा करने वाली थी। पति से सहवास सुख प्राप्त न होने पर पर-पुरूषों से रमण किया। पुत्र सन्तान भी हुई परन्तु पति पर-पुरूष-सन्तान सुख न मिलने से देहधारी सद्गुरू की शरण में जाकर उनसे दीक्षा लेकर प्रभू शिव की पूजा करके (सद्गुरू की सेवा करते हुए) सद्गति को प्राप्त हुई, पार्वती जगदम्बा की सखी बनी और अपने पिशाच बने पति की सद्गति करवा के उसे भी शिव-गण बना लिया।(स्कन्द पुराणान्तर्गत शिव-महिमा वर्णन रूपी माहात्म्य अध्याय ३-५)

इक्ष्वाकु कुल में राजा अनरण्य, जिनकी पॉच पट-रानियां थी, १०० पुत्र थे और दुर्गा का अवतार पद्मा नामक एक कन्या थी। राजा अनरण्य ने पृथ्वी पर सौ यज्ञ किये और देवता उन्हें इन्द्रपद प्रदान कर रहे थे परन्तु उन्होंने वह स्वीकार नहीं किया।ऋषि पिप्पलाद अनरण्य को (सब भस्म कर दूगा) शाप देने वाले थे कि देहधारी सद्गुरू ने राजा अनरण्य तथा उसकी सम्पत्ति को बचा लिया।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण पार्वतीखंड अध्याय श्लोक से पृष्ठ )

जब जलन्धर दैत्य द्वारा मारे गये देवताओं को, गुरू वृहस्पति मन्दराचॅल से दिव्य वनस्पति का रस पिलाकर जीवित करता रहा, तब दैत्यों के गुरू देहधारी शुक्राचार्य ने जलन्धर को युक्ति बताई, जिससे जलन्धर ने सभी देवताओं पर विजय प्राप्त कर ली।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण युद्धखंड अध्याय श्लोक पृष्ठ ) अनजाने में, केवल एक बार शिवयोगी का सत्कार करने का प्रत्यक्ष चमत्कारिक फल देखे। भगवान शंकर ही स्वयं सद्गुरू (ऋ़षभदेव) बन कर आ गये। मृतक राजपुत्र भद्रायु को जीवित किया, अमोघ शिव-कवच की दीक्षा दी, मंत्रों से भस्म धारण करने की विधि सिखाई, बारह हजार हाथियों का बल दिया और छिना हुआ राज्य वापस दिलवाया। इस चरित्र में तीन दिव्य ज्ञान प्राप्त होते है:-(क) दीक्षा लेकर प्रभू शिव की शिवलिंग में पूजन करने से या शिवऱ्योगी (जो शिव स्वरूप होता है) का सत्कार करने से अगला जन्म राजकुल में ही होता है (ख) भगवान शंकर ही गुरू रूप से किसी शरीर में प्रवेश करके आप को दीक्षा देते हैं (ग)मृतक भी जीवित हो जाता है।(घ)सासांरिक सभी कामनायें पूर्ण हो जाती है जैसे इस प्रसंग में छिना हुआ राज्य पुन: प्राप्त हो जाता है।(प्रमाण श्री शिवमहापुराण शतरूद्रसंहिता अध्याय श्लोक पृष्ठ तथा स्कन्द पुराण )

हिन्दू समाज के लिए गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामचरित मानस की रचना करके मानव समाज का बहुत बड़ा उपकार किया है परन्तु यह रहस्य है और ऐसा ही विधान है कि बिना सद्गुरू से सुने आप इस ग्रन्थ से कोई शुभ फल प्राप्त नहीं कर सकते। सकते। कौन सा ग्रन्थ आपके लिए उपयुक्त है, कौनसा देवता आपके उपयुक्त है, इसका निर्णय देहधारी सद्गुरू ही करता है। अन्त में श्री शिव की ही पूजा करनी होती है परन्तु उससे पहले पंचदेवताओं में से किसकी उपासना आपको करनी है उसका निर्णय देहधारी सद्गुरू ही करते है। (श्री गणेश, सूर्य, विष्णु, दुर्गा, शिव) मनुष्य भी पॉंच प्रकृतियों के होते है, तामस-राजस-राजस मिश्र, राजस, राजस सात्विक मिश्र और सात्विक। हमारा आश्रम आपकी प्रकृति आपको समझायेगा और प्रकृति के अनुसार उपासना का क्रम भी आपको समझायेगा। यह सुविधा आश्रम का सदस्य बनने पर ही आपको मिलती है। सदस्यता शुल्क के लिए आश्रम से सम्पर्क करे। सदस्यता शुल्क बैंक के डिमाण्ड ड्राफ्ट द्वारा जोधपुर पते पर भेंजे। श्री कैलास कपिल पब्लिक चैरिटेबल ट्रस्ट के नाम ड्राफ्ट भेजे। इस आश्रम को दिया गया दान आयकर की धारा ८० जी के अन्तर्गत आयकर से मुक्त है।

श्री भैरव की पूजा का रहस्य। श्री भैरव की पूजा किये बिना प्रभु शिव की पूजा का फल क्यों नही मिलता ? काशी में कपाल मोचन तीर्थ तथा काल भैरव की महिमा-दण्डपाणि के नित्य दर्शन का फल। प्रभु का ऐसा विधान है कि मानव के लिए, उसकी प्रकृति अनुसार, उसके पूर्व जन्म के संस्कारों के अनुसार उसकी प्रगति के लिए उसके लिए क्या उपासना अनिवार्य है। वह आप किसी धर्मशास्त्र में स्वयं नहीं ढूॅढ सकते बिना देहधारी गुरू के मार्ग-दर्शन के आप अन्धे ही है। ऑखे होते हुए भी आप अपना मार्ग स्वयं नहीं ढूॅंढ सकते। स्मरण रहे कि कोई भी ग्रन्थ हो उसमे चाबी नही, चाबी सब सद्गुरू के पास रहती है, ऐसा प्रभू का विधान है।श्री शिव महापुराण के वायुसंहिता उत्तरभाग में अध्याय ३१ में स्पष्ट संकेत है कि चारों वेद, १८ पुराण, १८ उप पुराण सभी एकमात्र शिव-तत्व का ही प्रतिपादन करते है। विष्णु, सूर्य, लक्ष्मी आदि देवता भी प्रभू शिव की आज्ञा बिना आपका हित नहीं कर सकते।

आजकल विश्व में योग का बहुत प्रचार हो रहा है। पातांजली योग दर्शन उपयोगी है। यदि आप सही देहधारी गुरू के मार्गदर्शन में योगिक क्रियाएं कर रहे हैं आजकल जो योगासन का प्रचार चल रहा है, वह भ्रामक है और जनता को गुमराम करने वाला है। योग का सही अर्थ है - निर्गुण ब्रह्म "शिव" में मिल जाना अर्थात् उनसे एकाकार हो जाना । यह योगिक क्रियाएं कठिन है और लाभ भी अपूर्ण है। भ्रष्ट हो जाने की संभावनायें अधिक है। श्री शिवमहापुराण में ऐसे अनेक सरल अनुष्ठान है ( जिनको सही देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर) करने से योगियों से उत्तम गति प्राप्त हो जाती है।

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