ब्रह्मर्षि,शिवयोगी,दण्डी सन्यासी श्री १०८
श्री ब्रह्मानन्द जी सरस्वती (कपिल महाराज) श्री कैलास कपिल पब्लिक
चैरिटेबल ट्रस्ट के व्यवस्थापक का संक्षिप्त परिचय
सृष्टि
के मालिक निर्गुण निराकार अजन्मा ब्रह्म है। वही अपनी इच्छा से सृष्टि
करने के लिए सगुण साकार पॉच मुख दस भुजा,जटा में बाल चन्द्रमा धारण
किए, गंगाधर,नीलकण्ठ ने अष्टभुजी सिंह वाहिनी दुर्गा का निर्माण
किया। विहार के लिए काशी का निर्माण किया वहॉं बाये अंग से विष्णु
को पैदा किया(सृष्टि का पालन करने के लिए) दॉयें अंग से ब्रह्मा
को उत्पन्न किया(सृष्टि उत्पन्न करने के लिए) अपनी दुर्गा से दो
शक्तियॉं उत्पन्न कर ब्रह्मा को सरस्वती और विष्णु को लक्ष्मी पत्नी
रूप् में दी।
ब्रह्मा ने पॉच प्रकार की सृष्टि उत्पन्न की परन्तु संतुष्ट नहीं
हुए तब श्री विष्णु की प्रेरण से ब्रह्मा ने तपस्या की, तब प्रभु
शिव अर्द्धनारी नटेश्वर (आधे शिव,आधी पार्वती)रूप में प्रकट हुए,
तब ब्रह्मा ने स्तुति की तब प्रभु शिव ने सत् सृष्टि उत्पन्न करने
का वरदान दिया।
तब ब्रह्मा ने मरीचि, अत्रि, पुलस्त्य,पुलह,क्रतु, अंगिरा, वसिष्ठ,
भृगु, दक्ष, नारद, सन्ध्या और कामदेव को उत्पन्न किया। फिर ब्रह्मा
ने (प्रभु शिव की आज्ञा से) अपने शरीर के दो भाग किए- स्वयंभू मनु
और शतरूपा। इन दोनों ने विवाह किया और तब से मैथुनी सृष्टि आरम्भ
हुई। इनसे प्रियव्रत तथा उत्तानपाद दो पुत्र हुए और प्रसूति, आकूति
और देवहुति तीन कन्यायें हुए। मरीचि से कश्यप हुए।
दक्ष प्रजापति ने पंचजनी स्त्री से १० हजार पुत्र उत्पन्न किये,
हर्यश्व आदि और असिक्नी से १०००,सबलाश्व आदि पुत्र उत्पन्न किये
परन्तु ये सब हर्यश्व और सबलाश्व आदि देवर्षि नारद जी की प्रेरणा
से पश्चिम समुद्र के तट पर, नारायण सर पर तपस्या करने के लिए गए
और निवृति मार्ग को अपनाया अर्थात उन्होंने अपने पिता ब्रह्मा की
आज्ञा न मानकर विवाह करना और सन्तान उत्पन्न करना स्वीकार नहीं किया।
तब दक्ष प्रजापति ने प्रसूति से ६० कन्यायें उत्पन्न की जिसमें बड़ी
कन्या सती शिव से ब्याही गई, १० कन्यायें धर्म को दी, १३ कन्यायें
पत्नी रूप में कश्यप को दी, २७ कन्यायें पत्नी रूप में चन्द्रमा
को दी, चार कन्यायें पत्नी रूप में गरूड़ को दी इत्यादि।
कश्यप-दिति से दैत्य उत्पन्न हुए(हिरण्यकशिपु, हिरण्याक्ष आदि)कश्यप-
अदिति से देवता उत्पन्न हुए(इन्द्र,सूर्य आदि) अंगिरा ऋषि के पुत्र
वृहस्पति से भरद्वाज,भरद्वाज से द्रोणाचार्य, द्रोणाचार्य से अश्वथामा
तथा अन्य पुत्र हुए। उनकी वंशावली में एक शंकरदास जी एवं माला देवी(कालिया)
सारस्वत ब्राह्मण, काश्मीर शैव सम्प्रदाय में जन्मे। शंकरदास के
पूर्वज पंजाब तथा पश्चिम राजस्थान के राजाओं के राजगुरू रहे। शंकरदास
के पुत्र पण्ड़ित दुर्गादत्त कालिया और उनकी पत्नी रत्ना देवी(वत्स
गोत्र के पण्डित मलावा राम प्रभाकर और उनकी पत्नी दुर्गा देवी) से
तीन पुत्र और दो कन्यायें हुई। बीच के पुत्रों में एक ब्रजमोहन नाम
के पुत्र हुए, जिन्होंने जोधपुर राजस्थान के सूर-सागर स्थित, झालियों
की श्मशान में एक विरक्त महात्मा श्री १००८ स्वामी शंकरानन्द जी
से पूजा एवं मंत्र दीक्षा ली। ब्रजमोहन मेकेनिकल इंजीनियर है और
राजस्थान सरकार तकनीकी शिक्षा विभाग से डिप्टी डायरेक्टर के पद से
१९९२ में सेवानिवृत्त हुए, उसके पश्चात् उन्होंने निरंजनी अखाड़े
के दक्षिणामूर्ति मठ के महामण्डलेश्वर श्री १०८ नृसिंह गिरि के शिष्य
महेशानन्द जी से सन्यास दीक्षा ली और रामघाट के ताम्बे महाराज से
दण्ड़ प्राप्त किया और तब से दण्ड़ी सन्यासी स्वामी ब्रह्मानन्द
सरस्वती नाम से प्रसिद्ध हुए। स्वामी ब्रह्मानन्द जी ने सद्गुरू
शंकरानन्द जी विरक्त के साथ भारत के चारों धाम, सातों पुरियों और
द्वादश ज्योतिर्लिंगों के दर्शन पूजन एवं अनुष्ठान किये। इसी बीच
में स्वामी ब्रह्मानन्द जी को हिमालय स्थित श्री अमरनाथ के धूणा
वाले विश्व प्रसिद्ध योगी श्री १००८ श्री जय शिव बाबा मिले। जिनसे
स्वामी ब्रह्मानन्द जी को कई सिद्ध विद्याएंॅ प्राप्त हुई। इन दोनों
महात्माओं द्वारा सिखाएं गए गुप्त मंत्रों एवं विद्या से ये अपना
कल्याण कर रहे हैं और सम्पर्क में आने वालों को भी नि:शुल्क मार्ग-दर्शन
दे रहे हैं । स्वामी ब्रह्मानन्द जी किसी को शिष्य नहीं बनाते, किसी
का धर्म परिवर्तन नहीं करते। संस्थापक- अध्यक्ष एवं कर्मकाण्ड व्यवस्थापक
के रूप में स्वामी ब्रह्मानन्द जी ने श्री कैलास कपिल पब्लिक चैरिटेबल
ट्रस्ट गऊघाटी मण्ड़ोर, जोधपुर पिन ३४२३०४ राजस्थान की स्थापना की
है।
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