शिव के अवतार
भैरवावतार:
श्री शिव और उनके अवतार भैरव में कोई अन्तर नहीं है। २४६७२ श्लोक वाले
श्री शिवमहापुराण के शतरूद्र संहिता अध्याय सं० ८ व ९ में यह रहस्य
,प्रभू शिव ने लोक कल्याण के लिए प्रकट किया है। पापों का नाश, पितरों
की सद्गति के लिए श्री शिव की उपासना ही एकमात्र उपाय है, परन्तु ये
सब सुख श्री शिव के अवतार भैरव की (देहधारी गुरू से दीक्षा लेकर) उपासना
करने से ही संभव है। काशी में रहते हुए जो कालभैरव का दर्शन-पूजन नहीं
करता, उसे किसी शुभ फल की प्राप्ति नहीं हो सकती उल्टे हानि ही होती
है। काशी ही विश्व में एकमात्र मोक्षदायिनी तीर्थ है। यहॉं मनुष्य
(संस्कारी या दुराचारी, कीट पंतग, पशु-पक्षी जो भी पंचक्रोशी क्षेत्र
में मरता है उसकी मुक्ति आज के कलियुग में भी हो रही है परन्तु दुराचारी
जो काशी में मरता है उसे मुक्ति से पहले ३०,००० वर्ष की भैरव यातना
भुगतनी पड़ती है जो कि यमऱ्यातनाओं से भी कठोर है। काशी में यमराज
का अधिकार नहीं है(प्रमाण श्री शिवमहापुराण कोटि रूद्रसंहिता अध्याय
२२-२३ ) भैरव जी, परमात्मा शिवजी के पूर्ण रूप है। शिव माया से माहित
पुरूष इस रहस्य को नहीं जानते है।( श्री शिवमहापुराण शतरूद्र संहित
अध्याय ८-९ पृष्ठ संख्या ५०९-५१४) श्री विष्णु लक्ष्मी को यह रहस्य
समझाते हैं। ( श्री शिवमहापुराण अध्याय ९ श्लोक सं० १०-१९ पृष्ठ संख्या
५१२)
काशी - सेवन से मुक्ति प्राप्ति के लिए और पापों के नाश एवं पितरों
की सद्गति के लिए श्री भैरव की सरल उपासना कैसे करनी चाहिए उसके लिए
इस आश्रम से मार्ग-दर्शन प्राप्त करें।
रूद्रावतार हनुमान:
प्रभु शिव के अवतार हनुमान भी है। श्री हनुमान की उपासना से महान संकट
दूर होते हैं, भूत-प्रेत की बाधा दूर होती है परन्तु हनुमान जी भी
प्रभु शिव की आज्ञा के बिना आपका स्थायी हित नहीं कर सकते। हनुमान
उपासना के लिए इस आश्रम से मार्ग-दर्शन प्राप्त करें।( श्री शिवमहापुराण
के कोटिरूद्र संहिता अध्याय १७ में प्रभुशिव के अवतार हनुमान जी की
महिमा का वर्णन है )भारतवासी मूर्ख हैं जो कि पुत्र सन्तान चाहतें
है।
नन्दिकेश्वर अवतार:
हमे हर शिव-मंदिर में एक सॉंड़ की प्रतिमा खड़ी या बैठी दिखाई देती
है। ये नन्दिकेश्वर है, प्रभु शिव ही है एक अवतार रूप में, ऋषि शालंकायन
के पौत्र है, शिलाद के पुत्र है, सुयशा के पति है और ब्रह्मा-विष्णु-महेश
ने ही इनका विवाह मरूत कन्या सुयशा के साथ कराया है। इनके सारे अंग
धर्म के ही अंग है। ये तपस्या से प्रभु शिव के वाहन बने है, इन्ही
की पीठ पर प्रभु शिव और पार्वती बैठकर भ्रमण करते हैं। ये ही प्रभु
शिव के द्वार पर हमेशा स्थित रहते हैं और इनकी आज्ञा के बिना विष्णु
ब्रह्मा भी प्रभु शिव का दर्शन नहीं कर सकते। नन्दिकेश्वर संबंधित
ज्ञान जानने के लिए देखे (अ)श्री शिव महापुराण,शतरूद्र संहिता अ० ६-७(ब)श्री
शिव महापुराण,युद्धखंड शंखचूड़ चरित्र में महाकैलास वर्णन अ० ३०(स)श्री
शिव महापुराण वायुसंहिता उत्तर भाग अध्याय नं०३१ |