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Narmada SangamNarmada Arti Puja

यमहास तीर्थ

दिव्य नदी नर्मदा के तट पर वह स्थान जहॅ यमराज ने तपस्या की थी व इस नर्मदा तीर्थ पर यमराज हॅंसे थे यमहॉस तीर्थ के रूप के विख्यात है। क्योंकि यमराज हस कर बोले की "जब पृथ्वी पर दिव्य नदी नर्मदा विद्यमान है, तब मूर्ख मनुष्य उस नदी का विधिवत सेवन नहीं करते हैं व और मेरे यमलोक में आते है।

विश्व की इस सर्वोतम तीर्थ नर्मदा के किनारे स्थित हे पर सर्वोतम सेवाश्रम "श्री विमलेश्वर महादेव आश्रम , नयापुरा रोड़, पोस्ट हंड़िया जिला हरदा (मध्यप्रदेश, भारत)" जो दिल्ली मुम्बई रेलमार्ग पर हरदा जंकशन से हाईवे नम्बर ५९ ए पर हरदा इन्दौर सड़क मार्ग पर हरदा से २० किलोमीटर पर श्री नर्मदा का नाभिक्षेत्र मे दक्षिण तट पर स्थापित है।

नर्मदा, समूचे विश्व मे दिव्य व रहस्यमयी नदी है, इसकी महिमा का वर्णन चारों वेदों की व्याख्या में श्री विष्णु के अवतार वेदव्यास जी ने १ स्कन्द पुराण के रेवाखंड़ में किया है। इस नदी का प्राकट्य ही, विष्णु द्वारा अवतारों में किए राक्षस-वध के प्रायश्चित के लिए ही प्रभु शिव द्वारा अमरकण्टक(जिला शहडोल,मध्यप्रदेश जबलपुर-विलासपुर रेल लाईन-उडिसा मध्यप्रदेश ककी सीमा पर) के मैकल पर्वत पर कृपा सागर भगवान शंकर द्वारा १२ वर्ष की दिव्य कन्या के रूप में किया गया। महारूपवती होने के कारण विष्णु आदि देवताओं ने इस कन्या का नामकरण नर्मदा किया। इस दिव्य कन्या नर्मदा ने उत्तर वाहिनी गंगा के तट पर काशी के पंचक्रोशी क्षेत्र में १०,००० दिव्य वर्षों तक तपस्या करके प्रभु शिव से निम्न ऐसे वरदान प्राप्त किये जो कि अन्य किसी नदी और तीर्थ के पास नहीं है :'

प्रलय में भी मेरा नाश न हो। मैं विश्व में एकमात्र पाप-नाशिनी२ प्रसिद्ध होऊ ,यह अवधि अब समाप्त हो चुकी है।
मेरा हर पाषाण (नर्मदेश्वर) शिवलिंग के रूप में बिना प्राण-प्रतिष्ठा के पूजित हो३। विश्व में हर शिव-मंदिर में इसी दिव्य नदी के नर्मदेश्वर शिवलिंग विराजमान है। कई लोग जो इस रहस्य को नहीं जानते वे दूसरे पाषाण से निर्मित शिवलिंग स्थापित करते हैं ऐसे शिवलिंग भी स्थापित किये जा सकते हैं परन्तु उनकी प्राण-प्रतिष्ठा अनिवार्य है। जबकि श्री नर्मदेश्वर शिवलिंग बिना प्राण के पूजित है।
मेरे (नर्मदा) के तट पर शिव-पार्वती सहित सभी देवता निवास करें।

सभी देवता,ऋ़षि मुनि,गणेश,कार्तिकेय,राम,लक्ष्मण,हनुमान आदि ने नर्मदा तट पर ही तपस्या करके सिद्धियॉं प्राप्त की। दिव्य नदी नर्मदा के दक्षिण तट पर सूर्य द्वारा तपस्या करके आदित्येश्वर तीर्थ स्थापित है। इस तीर्थ पर (अकाल पड़ने पर ) ऋषियों द्वारा तपस्या की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर दिव्य नदी नर्मदा १२ वर्ष की कन्या के रूप में प्रकट हो गई तब ऋषियों ने नर्मदा की स्तुति की। तब नर्मदा ऋषियों से बोली कि मेरे (नर्मदा के )तट पर देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर तपस्या करने पर ही प्रभु शिव की पूर्ण कृपा प्राप्त होती है। इस आदित्येश्वर तीर्थ पर हमारा आश्रम अपने भक्तों के अनुष्ठान करता है।

नर्मदा की महिमा

यह दिव्य - नदी नर्मदा अमरकण्टक के मैकल-पर्वत से प्रकट होकर (उडिसा मध्यप्रदेश की सीमा) पश्चिम वाहिनी है और मध्य-प्रदेश महाराष्ट्र में से होती हुई गुजरात के रत्नासागर(अरब सागर) में जिला भरूच में सागर में मिल जाती है। इस दिव्य नदी का परिचय चिरंजीवी मृकण्डु पुत्र मार्कण्डेय जी ने (जो नर्मदा-तट पर आज भी विद्यमान है) वनवास भोग रहे पाण्ड़वों को दिया जो कि नर्मदा-पुराण के नाम से प्रसिद्ध है।
पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ, यज्ञ, दानादि है, उन सबका शुभ फल उस व्यक्ति को प्राप्त हो जो कि देहधारी सद्गुरू से दीक्षा लेकर मेरे तट पर ३० दिन का "कल्प" करे। इस आधार पर हमारा श्री विमलेश्वर महादेव आश्रम अपने भक्तों को ३० दिन का कल्प कराता है।भक्तों के लिए यह कल्प नि:शुल्क है। अन्य लोगों को कल्प का व्यय अग्रिम राशि के रूप में जमा करवाना होता है। इस कल्प में आवास-भोजन-पूजा सामग्री-पूजा विधि सम्मिलित है। यह तीस दिन का कल्प आज हमारे आश्रम के अतिरिक्त और कोई नहीं करा रहा है।
एक मात्र दिव्य नदी नर्मदा ही सर्वत्र पुण्य दायिनी है, जहॉं अनेकों दिव्य तीर्थ है। उदाहरणत: अमरकण्टक जहॉं से दिव्य नदी नर्मदा प्रकट हुई। उस अकेले स्थान पर ३.५ करोड़ तीर्थ विद्यमान है। शुक्लतीर्थ और गंजालेश्वर तीर्थ- कोटीश्वर तीर्थ (गंगा-सागर संगम पर) जैसे अनैकों तीर्थ विद्यमान है। इनमें एक यमहास तीर्थ है इस दिव्य नर्मदा के तट पर एक मर्कटा-तीर्थ है जहॉं एक बंदरियां ने शरीर त्याग कर अगले जन्म में रानी बनी। यहॉं तपस्या करके शरीर त्यागने पर मनुष्य का अगला जन्म राजकुल में होता हैं और वह महा रूपवान होता है। दिव्य नदी नर्मदा के तट पर अमलेश्वर - औकांरेश्वर ज्योतिर्लिंग भी विद्यमान है।
अमृत को जो व्यक्ति पीता है वह अकेला ही अजर-अमर हो जाता है परन्तु दिव्य नदी मॉं नर्मदा का जो व्यक्ति (सद्गुरू से दीक्षा लेकर) मर्यादा-पूर्वक सेवन करता है उसका सम्पूर्ण कुल ही तर जाता है। यह रहस्य जो जानते है, उनके परिवार का एक सदस्य नर्मदा तट पर ही रहता है और उसके प्रभाव से उसके परिवार के सभी सदस्य घर पर ही रहते हुए सुख-शांति और सौभाग्य का अनुभव करते है। इसी दिव्य नर्मदा तट पर आदि गुरू शंकराचार्य को श्री गोविन्द पादाचार्य से दीक्षा प्राप्त हुई।
नर्मदा एकमात्र नदी है, जिसका (बिना देख ही)घर पर एक विशेष श्लोक द्वारा स्मरण करने पर श्री नर्मदा स्नान का फल मिल जाता है।
दिव्य नदी नर्मदा के तट पर रहते हुए केवल दर्शन मात्र से ही एक जन्म के पापों का नाश हो जाता है।
इसके जल में मर्यादा-पूर्वक स्नान करने से सात जन्मों के पापों का नाश हो जाता है।
दिव्य नदी के तट पर सभी देवताओं, सभी मंत्रों की सिद्धियां प्राप्त हो जाती है।
आज कलियुग में एकमात्र यही दिव्य नदी नर्मदा तीर्थ है जो कि प्रभावकारी है। यहॉं की गई सभी क्रियाएं करोड़ गुना हो जाती है। आपने एक रूपये का दान किया तो वह करोड़ गुना हो जायेगा। इस दिव्य नदी का निर्माण पापों के प्रायश्चित केे लिए ही प्रभु शिव द्वारा अमरकण्टक में किया गया था। राजा लोग अपने गुरूदेव की आज्ञा से इस दिव्य नर्मदा-नदी के तट पर आते, मर्यादा-पूर्वक प्रायश्चित क्रिया करते और यहॉं भूमि, स्वर्ण आदि का दान करके वापस चले जाते थे।
द्रोणाचार्य के पुत्र, प्रभु शिव के अवतार चिरंजीवी अश्वत्थामा जी जिन्होंने महाभारत युद्ध में कौरवों के पक्ष से पाण्ड़वों के विरूद्ध लड़े और श्री कृष्ण सहित पाण्ड़वों को परास्त किया वे भी इसी दिव्य नदी नर्मदा के तट पर आज भी भक्तजनों को दर्शन देते है।
हनुमान जी की माता अन्जना(जिन्होंने दूधी नदी प्रकट की और जिसका संगम नर्मदा नदी के संग है)वे भी नर्मदा नदी के तट पर विराजती है।
इस दिव्य नदी नर्मदा के नाभिक्षेत्र,अल्कापुरी धनाध्यक्ष कुबेर द्वारा स्थापित ऋद्धीश्वर, सिद्धेश्वर महादेव तथा काल-भैरव की तपस्थली पर हमारे आश्रम द्वारा स्थापित श्री विमलेश्वर आश्रम है।

नर्मदा प्रभाती :-
जय जय जगदम्ब माता नर्मदा भवानी।
निकसि जलधार जोर, पर्वत पहाड़ फोड़।
दुष्टन के गर्व तोड प्रगटी महारानी।
घाट - घाट छवि अनन्त, सेवत सिद्ध साधु सन्त।
भक्तन आनन्द देत, देवराज धानी,
भूषण अम्बर विशाल, केशर की खौर भाल।
मानो रवि उदयकाल, शोभा सुखदानी।
अमरकण्ट प्रगट भई, सागर सों मिलन गई।
मध्यकोटि तीर्थ रचे, मुक्ति की निशानी।
औंकार महिमा अपार, शूलपाणि धुॅंआधार।
शंकर कैलास त्याग बसे संग भवानी।
जय जय जगदम्ब माता नर्मदा भवानी।

१. (ऋषि पराशर-सत्यवती के पुत्र) ने काशी के मध्यमेश्वर शिवलिंग (दारा नगर मैदागिन में स्थित) पर तपस्या करके प्रभु से १८ पुराण, १८ उपपुराणों की रचना की शंक्ति प्राप्त की
२. श्री गंगा केवल पाप-वाहिनी है-श्री नर्मदा ही एकमात्र पाप-नाशिनी है। श्री शिवमहापुराण के कोटि रूद्रसंहिता अध्याय ५-७ से यह प्रमाणित है कि हर वर्ष वैशाख शुक्ल सप्तमी को गंगा अपने पाप छोड़ने के लिए दिव्य नदी नर्मदा में आती है। भविष्य पुराण के अनुसार गंगा नदी की प्रभावशाली अवधि कलियुग के ५००० वर्ष तक ही थी।
३. श्री गंगा जो कि भगवान शिव के सिर ऊपर चौबीस घण्टे विराजमान रहती है फिर भी उसका एक भी पाषाण शिवलिंग के रूप में पूजित नहीं होता।

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